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शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

जय हो हिंदी मार्तु-भाषा की ....!!!

सबको हिन्दी से हिन्दी को सबसे है पूरी आशा ,
फूले-फले दिन-रात चौगुनी ,जन-मानस की ये भाषा ।🌹

निहित है इसमें पूरे,देश राष्ट्र -धर्म की मर्यादा ,
जितना इसका मंथन होता ,बढ़े ज्ञान अमृत  ज्यादा ।🌹

बदल रहें इसके कार्य -क्षेत्र ,बदल रही है परिभाषा,
आभाषी मन मचल रहे हैं ,ले एक नयी मन में जिज्ञाषा 🌹

इसमें समाहित है महा-कुम्भ ,रस, श्रृंगारों,भावों और छंदों का ,
हर शंकाओं-आशंकाओं का समाधान,मन के अन्त्रद्व्न्धों का ।🌹


हर भाषा है महान ,साहित्यिक

गौरव की समृधि है ,

परंतु 'कमलेश' हर भाषा की सिरमौर ,
मेरी मां- बोली ''हिन्दी'' है ॥🌹🌹

🌹कमलेश वर्मा *कमलेश*🌹



शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

यूँ तो तेरा ही नाम .....!!!





यूँ तो तेरा ही नाम ,  बसा है सबके दिल में ,
होती है तेरी ही चर्चा, दिल जलों की महफ़िल मे। 

तेरी अदा  के मारे  ,जीते हैं न मरते हैं ,
कर  गये कितने कूच , 'ले'हसरतों को दिल में। 


अब न रही कोई ख्वाहिश ,  न बाकि कोई तमन्ना ,
बस  तू  ही तू है ,उनकी नजर की  मंजिल  में। 

कोशिस सभी की है,  बस  जाएँ आँखों में तेरी ,
पर होती नही कोई हलचल, तेरे इस संग-दिल में। 

अब''कमलेश'' क्यों तराशूं  , उनकी यादों के बुत को ,
जब की होती है उन्ही की चर्चा , हर महफिल में।। यूँ तो तेरा .............[० ]



गुरुवार, 23 अगस्त 2012 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

लगते हैं बेचारे हम ....!!!

 
हम चाहे तो आसमान को, टुकड़ों में तोड़ दें ,
 सागरों के मुहाने को, जिधर चाहे मोड़ दें

रौशनी की मोड़ देते हैं राह , उसकी ही राह में , 
बिजलियों को कैद कर दें ,उन्ही की सैरगाह में

मजाल है कोई चला जाये , हमारे मुहं पर बोलकर , 
सिंहों के भी दांत गिने हैं ,हमने मुहं खोलकर

फिर दुनिया को क्यों नही ,लोहा मनवा पाते हैं , 
नर्म ,अस्थिर ,धर्म-विभाजित 'राष्ट्र'क्यों कहलाते हैं ?

अब नवयुवकों को बदलना होगा , इस सड़े निजाम को,
'
कमलेश'अब निश्चय कर करो ,देश के इस काम को


सोमवार, 20 अगस्त 2012 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

हंसी बेशकीमती है,,,,,खुल कर हंसो ..!!!


ना हंसी की कोई कीमत दे पाया, ना रोने का कोई मूल्य उतारेगा ,
बस अगर कोई दे पाया हंसी , उसी हंसी से उसको संवारेगा ।

हंसने को कोई भी हंस दे ,पर उसमे दिल की गहराई हो ,
हंसने की वजह हो जायज , जो दिल से बाहर आयी हो ।

हंसना ऐसी प्रकिर्या है कुदरत से ,सबको मिलती है ,
कोई अंदर दफन रखता है ,चेहरे पर किसी के खिलती है

खुलकर हंसना जिन्दगी में ,रब की एक नियामत है,
पर किसी का किसी पर हंसना ,उसके लिये कयामत है।

'कमलेश' ख़ुशी मनाएं खुलकर, जोर=जोर से हंस कर ,
दो सबको हंसी - ख़ुशी उनके, मन-मानस में बस कर ॥


गुरुवार, 16 अगस्त 2012 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

पहचानों उन गद्दारों को ......!!! आज़ाद मैदान की घटना पर क्षोभ, .



पहचानो उन गद्दारों को ,जिन्हें नही वतन से प्यार है ,
जिसे नही मुहब्बत इस मुल्क से ,वह देश का गद्दार है

होता है कोई जुर्म कहीं पर .खून-खराबा ये क्यों करते हैं ,
चले जाएँ ये उसी मुल्क को ,फिर ये यहाँ क्यों रहते हैं

जिस तरह हुआ हिंसा का तांडव ,खुल नंगे नाचे उन्मादी ,
अपने इन्ही कुकर्मों को ,कहते ये हैं कर्म 'जिहादी'॥

लानत है ऐसे ज़ज्बातों को.जो देश को ही खा जाएँ ,
या खुदा ,रब दे मति इनको ,सद्बुद्धि देश प्रति जाये ।

''कमलेश'' क्या होगा इनके चलते ,बापू के सपनों का ,
दूसरों के जख्म भर जाते हैं ,वो क्या भरे जो दिया हो अपनों का ॥
मंगलवार, 14 अगस्त 2012 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

जिन हवाओ की कोई मंजिल .....!!!!


जिन हवावों की कोई मंजिल ना हो ,उनको यहाँ उतारा जाये ,
बिगड़ी हुई है जो शक्ल आईने की ,उसको जरा सुधारा जाये

जिन कानों में ना पहुँचती हो आवाम की थोड़ी भी आवाज ,
बताओ ?उनको किस नाम से , अब किस तरह पुकारा जाये

जलती तो है चिंगारी की लौ सबके रुई जैसे नाज़ुक दिल में ,
पर उसे कैसे ? धधकते अंगारों के मानिंद उभारा जाये

जो लोग समझते हैं हम एवरेस्ट पर, बैठे पहले से ही थे ,
उनको यथार्थ के धरातल पर, जबरदस्ती उतारा जाये

''कमलेश'' क्यों नहीं समझते की ,कर्म जग में करो ऐसा ,
नाम की वजह से नहीं, काम को याद कर पुकारा जाये ..





मंगलवार, 24 जुलाई 2012 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

रिमझिम -रिमझिम मेघ ....!!!


रिमझिम -रिमझिम मेघ बरसता ,गिरती बूँदें शाखों से ,
याद के बादल जब-जब छाये ,निर्झर निकला आँखों से ।

देख उमड़ते मेघों को ,मोर -मोरनी संग नाचे ,
पिया बसे परदेश जा, सजनी बैठी पाती बांचे ।

मौसम बैरी इस विरहन की ,मिलन की आग जलाये ,
आ जाओ इस विरह घड़ी में, बैठी हूँ आस लगाये ।

बहुत सुहाना मौसम है , वक्त बड़ा ही सुंदर है ,
मन की आँखों से तुम पढ़ लो , जो मन के अंदर है,

'कमलेश ''वर्षा -ऋतु में नव जीवन का संचार हुआ ,
हरी-भरी हो गयी धरती ,आनंदित सारा संसार हुआ ॥


सोमवार, 23 जुलाई 2012 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

दर्द को हंस कर ...!!!

कैसे बताऊँ उस दर्द को जो नासूर हो गया ,
दर्द को हंस कर सहने को , दिल मजबूर हो गया

वक्त अपनी ही चाल से कैसे,वक्त काट देता है यहाँ ,
वक्त जिसे समझे थे एक, उसको भी बाँट देता हैं यहाँ

दर्द को भी दर्द होता होगा जरूर एक बार जिन्दगी में ,
जब कोई दर्द बिछुड़ता होगा , उसकीअपनी जिन्दगी से

ना
हो उनको कोई अहसास ,कोई हमें फ़िक्र नही ,
कहीं अहसास ही ना ख़त्म हो जाये, बस फ़िक्र है यही

''कमलेश'' गुजारिस हैं कोई ना बदले रिश्तों के रूप को ,
लगे ना नजर किसी की , रिश्तों की चमकती धूप को .


कितना भी हो अत्याचार....!!!

कितना भी हो अत्याचार , जन -विश्वास तोड़ नही पाओगे ,
हमको मिटाने के चक्कर में, खुद ही यहाँ मिट जाओगे

साम -दाम और दंड भेद हत्कंडे सारे, अपनाओ तुम ,
चाहे निरपराध को अपराधी, कितना भी ठहराओ तुम

नहीं माफ़ करेगा जान मानस ,ना इतिहास दोहराएगा ,
जो जुल्म हो रहे इस वक्त यहाँ ,कोई क्यों भूलना चाहेगा

यहाँ प्रजा-तन्त्र है ना की राज-तन्त्र ,यह इनको समझाना होगा ,
इस तन्त्र की सीमायें हैं इन ''काले'' अंग्रेजों को बतलाना होगा

नहीं किसी से बैर हमें ना, करते किसी वर्ग का ''फेवर'' हैं ,
यह मात्र उस की झलकी है, जो इस वक्त देश के तेवर हैं

शासकों वक्त की कद्र करो ,ये वक्त कभी नहीं झुठलाता है ,
कभी ''कमलेश
'' ताज बना ,पाषाण कभी शिव बन जाता है


गुरुवार, 12 जुलाई 2012 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

टूटता नीड़ देख कर .....!!!!

देख कर नीड़ टूटता मेरा मन सिहर गया ,
वर्षोँ से सहेज़ा था जिसे पल में बिखर गया

यह
सुंदर घोंसला सम्मिलित प्रयासों की तावीर थी ,
अच्छी
परिश्रमी परिवार की सुंदर तस्वीर थी

पता
नही चलते -चलते रास्ते ,खुद ही मुड़ गए ,
पंछी
जिस डाल पर बैठे थे ,खुद ही उड़ गये

प्यार
की नींव क्यों, इक दम दरक गयी ,
जो
मजबूत थी इमारत फिर ,क्यूँ गिर गयी

कैसे
-कैसे इम्तिहान आते हैं, जिन्दगी के दौर में ,
इक
दम अँधेरा हो गया, जिन्दगी के भोर में

लोग
बदलें जमाना बदले,खुद को बदल लीजिये ,
गुजारिस है ''कमलेश'' मुझको, बदलने की कोशिश मत कीजिये
सोमवार, 9 जनवरी 2012 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

क्या ? ईमानदारी की .....कीमत चुकानी पड़ेगी !!!

क्या ? ईमानदारी को कीमत चुकानी पड़ेगी ,
झूठ से सच को मुहं की खानी पड़ेगी

इतनी धुंध छाई है झूठ की हर तरफ ,
सच्चाई को अपनी परछाई छुपानी पड़ेगी

जब हम बोलते हैं की सच है यही ,
उस सच की भी सच्चाई बतानी पड़ेगी

सौ बार कहने पर बन जाता है ''बछड़ा -मेमना ,
मतलब साख सच्चाई को भी गंवानी पड़ेगी

तलवार की धार बन कर रह गयी है सच्चाई ,
गर चलना है तो पैरों की चमड़ी कटानी पड़ेगी

मायूसी भरी रात में भी उम्मीदों के चिराग जलते हैं ,
क़ुरबानी के मोम से सच्चाई की लौ जलानी पड़ेगी

पतंगों के माफिक जान देकर शमां के लिये ,
बुझती हुई शमां को मशाल बनानी पड़ेगी

''कमलेश''जीत होती हमेशा रही है सत्य की ,
झूठ पर यही जीत भविष्य की निशानी बनेगी


शनिवार, 24 सितंबर 2011 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

कैसी है ! ये स्याह रात ...!!

कैसी है ! ये स्याह रात , कैसी ये तन्हाई है ,
फिर क्यूँ ऐसे हालत में, तेरी याद आयी है ,

ना कोई सबब बनता है ,दिल तुझे याद करे ,
मगर जिगर में क्यूँ कर, हूक सी उठ आयी है ,

पुराने जख्म ना कुरेदे कोई, यादों के खंजर से ,
बड़ी मुश्किल से इससे ,दिल ने निजात पाई है ,

कैसे जी लेते है वो ! बे-वफाई के दागों के साथ ,
कभी नही हुई देखो जमाने में, इनकी रुसवाई है ,

जलाल--इश्क को ज़नाब , कमतर ना आंकिये ,
'कमलेश' इश्क के जलवों में ये कायनात नहाई है





शुक्रवार, 23 सितंबर 2011 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

मन में उठे तूफानों को ....!!!


मन में उठे तूफानों को कैसे, समझाया जाए ,
लगता है इसे माया जाल में, उलझाया जाए ,

इसके अपने उसूलों को, कौन समझ पाया है ,
दस्तूरे-दुनिया क्या है ,इसे आज बताया जाए, ,

क्यों समन्दर की मानिंद ,बना रखा है खुदको ,
जो ख्वाहिशें हुई नही पूरी, उनको दबाया जाए ,

हर दीवार तोड़ने की रखता है दिल में ख्वाहिश ,
अपनी हदें क्या हैं इसकी ? ,इसको बताया जाए,

अच्छा है ! कोई भी तूफ़ान मचल जाए कहीं भी ,
'मगर'' कमलेश' तूफानों में मचलने का सबब पाया जाए
शनिवार, 17 सितंबर 2011 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

अभी बेफिक्र हो के ना ज़नाब सोइए ...!!!

बेफिक्र हो के जनाब आप अभी ना सोइये ,
अभी जो जख्म हैं ताज़े ,उनको तो धोइये ,

ना समझो की गद्दार, सब खो गये हैं कहीं ,
सापों की मानिंद, बिलों में छुप गये हैं यहीं ,

ढूंढ-ढूंढ कर मारो, इन विष-भरे नागों को ,
तोड़ सके ना ये हमारे, एकता के धागों को ,

अब ना पनपने देंगे,हम गद्दारों की टोली को ,
रक्त-रंजित होने दें हम, ईद और होली को ,

'कमलेश 'हर मन में देश -प्रेम का बीज बोना होगा ,
सब होंगे सजग फिर बेफिक्र, हो के सोना होगा पर ..

बेफिक्र हो के जनाब आप अभी ना सोइये ,
अभी जो जख्म हैं ताज़े उनको तो धोइये ...,॥



गुरुवार, 8 सितंबर 2011 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

कब छटेंगे भय के बादल...!!!

कब छटेंगे भय के बादल, कब होगी दूर उदासी ,
कब हम सब कह पाएंगे 'हम हैं भारतवासी' ।

सब मिल बैठें ,मिल कर, कुछ तो ऐसा सोचो ,
भेद-भाव की मैल को , अपने दिलों से पोंछों ,

क्या करोगे इन हालातों में जब, भारत मां की छाती पिघलती है ,
दिल फट जाता है इस माँ का भी, जब लालों की चिताएं जलती हैं,

कब तक दुश्मन खेलेगा हमारी 'भारत मां '' की अश्मत से ,
कब तक बाधें रखोगे अपने को ,राजनीति की किस्मत से ,

तोड़ो बंधन छोडो क्रन्दन ,बन ज्वाला मुखी फूट पड़ो ,
सर्वनाश की बन ज्वाला ,दुश्मन पर तुम टूट पड़ो ,

रोज-रोज किश्तों में मरना नही ,कुछ तो अब करना होगा ,
हमको अब जीना होगा, उनको अवश्य अब मरना होगा ,

'कमलेश 'नही हट सकती है, सबके ज़िम्मेदारी कंधों से ,
भगवान बचा ले अब भी देश को, राजनीति के फंदों से

सोमवार, 29 अगस्त 2011 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

सूरज पर आग जलेगी ...!!


देखा दिल कहता था, हिम पर भी आग जलेगी !!
जो दबी पड़ी थी बरसों से, वो ज्वाला भी पिघलेगी ,।

बन गयी ज्वाला युवा-शक्ति ,अन्ना की चिगारी से ,
बिछ गये फूल अन्ना की खातिर, देश की हर क्यारी से ,.

देश -प्रेम के जज्बे को, हर दिल में इतना उभार दिया ,
हर क़ुरबानी की खातिर सबने, अपने को तय्यार किया ,.

भूखे रह कर इक सन्यासी का, चमत्कार अनोखा था ,
वो भी असमंजस में फंसे रहे, जिनके मन में धोखा था ,.

अभी आन्दोलन नही खत्म हुआ बस अनशन ही छोड़ा है ,
बस जन-मानस के हिर्द्यों को जड़ से बहुत जिन्झोड़ा है ,.

'कमलेश'अभी तो देश की कुछ ही हुई मांगे पूरी हैं ॥,
''अन्ना' के भारत की मूर्ती रहती अभी बहुत अधूरी है ..,,..


मंगलवार, 9 अगस्त 2011 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

अब सबकी नज़र में है ....!!!


अब सबकी नजर में है कारवां की रह -गुजर ,
तबसे हुई है उनकी[सत्ता]हम पे तिरछी नजर ,

मंजिल तक पहुंचना गर हुआ नसीब में ,
नही रोक सकता कोई इन्हें तूफाने-कहर ,

ये होश में आ जाएँ तो होगा बहुत अच्छा ,
घुलता जाता है फिजां में बे-चैनी का जहर ,

ये क्यों नही समझते सारी दुनिया का दर्द ,
कहीं टूट ना जाये उनकी ही दुनिया का सबर ,

जिदों से टूटते वक्त ने देखे हैं कितने ताजो-तख्त ,
खुदा !क्या ?होने वाला है इनका भी वही हसर ,

'कमलेश 'जो लबरेज़ हो सारी दुनिया के प्यार से [समर्थन ],
क्या बदलेगा शक्लो-सूरत उनकी ,सत्ता का ज़हर ॥

सोमवार, 27 जून 2011 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

रिश्तों पर अविश्वास ....!!!

रिश्तों पर अविश्वास का बादल क्यों घना ,
ये थोड़े दिनों से या बहुत पहले बना है ,

सोचो में इतना संकुचन कैसे हो रहा है ,
या खुद खो रहे या विश्वास खो रहा है ,

क्या सामाजिक मूल्यों का अब वजूद नही है ,
दायित्वों के परिपालन के बावजूद नही है ,

कैसे समाज की संरचना बदल रही है ,
हर नवागंतुक ,विहाग को मचल रही है ,

शायद जो 'कमलेश 'हम सोच रहे हैं मन में ,
वह होना होता है सब के इस जीवन में

मंगलवार, 14 जून 2011 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

कैसे टूटे इनका मनोबल ...!!!


सब तरफ से लग रहा है जोर इस बात का ,
कैसे मनोबल तोडा जाये इस जमात का

लगे हुए हैं सत्ता के ''चतुर ''इनको उलझाने में ,
घुटे' गुरु घंटालों '' को ये भी लगे हैं समझाने में

नही -है इतना आसां हल करना ,इस मुद्दे को ,
जैसे ''हड्डी'' से दूर करना मुस्किल होता कुत्ते को '॥

पर इस कवायद का कोई ना कोई वाद बनेगा ,
जो भी बनेगा वो इतिहास में एक अपवाद बनेगा

जनतंत्र को ''प्रजा-तन्त्र ''इनका ये मनन अनोखा है ,
चुनाव से पहले ''जन '' ,बाद ''प्रजा ''को देते धोखा है

पर ''अन्ना'' की इस आंधी में, ये सब बह जायेंगे ,
जों बहेंगे इस आंधी के साथ वो ही कल बच पाएंगे

''कमलेश''कोई समझाओ इन कम अक्ल के अंधों को ,
देश की जन-शक्ति ने ,पहले भी तोडा है ख़ूनी ''पंजे '' को



सोमवार, 28 फ़रवरी 2011 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

क्यूँ खेलते हैं दिल से ...!!?


क्यूँ ?खेलते हैं दिल से ,इस जहाँ के लोग ,
ये इतने हैं बेदर्द !ये हैं कहाँ के लोग !!?

रखते नही लिहाज़ जरा भी, मुहब्बत के का ,
रुतबा दिखाते हैं हमेशा, अपने झूठे गरूर का

गर नही चला जाता था मंजिल--जानिब ,
तो क्यों ?मेरी तरफ हाथ बढ़ाना जरूर था

बस अपना हो मकसद हासिल,ये तेरी सोच थी ,
इसमें मंजिल का नही ! सोच 'का ही कसूर था

'कमलेश' देखेगी दुनिया प्यार के, नाम को इस तरह ,
कहेगी !! ये तो प्यार नहीं दिमागे-फितूर था