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कमलेश वर्मा
तुम झांको मेरी आँखों में ,जरा करीब से ,
न नापो अरमानों को ज़माने की ज़रीब से ।

''कभी न मिले दो दिल '',
ये तो ज़माने की फितरत है ,

तुम तो मिल जाओ ,अब
जब मिले हो नसीब से ।

इल्जाम देना तो, जमाने का काम है ,
प्यार करना भी तो सीखा है ,
अपनी ही तहजीब से ।

तूफ़ान बरपा हो गया ,
ज़माने की गलियों में ,
हमने कदम निकाले भी ,
नही थे ,दहलीज से ।

''कमलेश'' गुनाह पूछा भी नही ,
ktl कर दिया ,
खुदा इनको बचा ले ,
इस गुनाहे अज़ीम से ॥
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कमलेश वर्मा

तुम भी वही निकले ,जिसका गुमान था ,


इक बार फ़िर दिल ने देना इम्तिहान था ॥


पहले भी टूटी थी बिजलियाँ ,इस मुकाम पर ,


उनका गवाह नीचे जमीं ,ऊपर असमान था ।


शक भी जरा सा होता ,तो कुछ सोचते हम ,


पर क्या पता ?पहले से दिल बे -इमान था ।

लुट गया कारवां ,मंजिल से पहले मेरा ,

उसके हाथों लुटा जो ,निगेहबान था ।

''कमलेश'' शायद फ़िर कोई आएगा कहीं ,

जो प्यार का असली कद्रदान था

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कमलेश वर्मा
जिन्दगी क्यों बनी,दुश्मन जिन्दगी की ,

उसी ने दी बददुवा , जिसकी बंदगी की


काश ; समझ पाते फितरत उसकी ,

लिख लेते इबारत चेहरे पर, पसंदगी की


था अकेला तो भी खुश था ,

किसी ने दे दी कसम, पूरी जिंदगी की


जीते जी मर गये ''कमलेश '' हम तभी ,

जब निकली कातिल जिन्दगी, ख़ुद जिन्दगी की
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कमलेश वर्मा
जिन्दगी चलती जा रही, किस ओर है ,

मिलन इस छोर पर ,बिछुड़ना उस ओर है


सिमट जाएँगी यादें ,जहन में कहीं ,

पूछेगी जिन्दगी, ये कौन सा मोड़ है


खुश हो लेंगे हम ,मिले थे कभी ,

उन खुशनुमा लम्हों का , अहसास बेजोड़ है


क्यूँ सोचते हैं ,जुदा हो जायेंगे हम ,

क्या डोर अपने प्यार की ,इतनी कमजोर है


'
कमलेश' निभा लो जब तलक ,निभे दोस्ती ,

जिंदगी जीने की वजह ,तो कुछ और है
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