मंगलवार, 18 सितंबर 2018 | By: kamlesh chander verma

हुआ है क्या लोगों..💐💐

हुआ है क्या लोगों ,आज़ के ज़माने को,
ढूंढता है क्यूँ ,हर गली जाती है मयख़ाने को।💐

छोड़ दी पीनी हमने ,उसके इसरार पर
पाबन्दी लगा दी है मगर, उसने हमें बताने की।💐

नींद भरी आंखों में ,ना देखो लाल डोरों को,
परछाईं है उसकी मय भरी 'आंखों के पैमानों की।💐

लड़खड़ाता हूँ मैं ये सबको ,बहुत अजीब लगता है,
पर क्या करूं ये अदा है मेरी ,मंज़िल तक पहुंच जाने की।💐

आसान नहीं है  इश्के-इबादत ,इस स्याह दुनिया में,
आग के दरिया में है राहे-डगर ,मुहब्बत के आस्ताने की।💐

हम पर जुल्मों ,ज़बर, पाबंदियों का ,दौर भी गुज़रा है,
छोड़ी ना कसर दुनिया ने, प्यार की हद को आजमाने की।💐

सदियों से एक रिवायत बना रखी है , इश्क़ के परवानों ने,
'कमलेश' निभाते हैं कसम अब तक शमां पर मिट जाने की।।💐💐

@कमलेश वर्मा 'कमलेश'

पटियाला💐💐

रविवार, 16 सितंबर 2018 | By: kamlesh chander verma

ये कैसा शहर है..💐

ये कैसा शहर है
ना कोई काफ़िया
ना कोई बहर है।💐

क्यूँ उनींदा सा है ए
बोझिल पलकों में
सुबह की पहर है।💐

क्यूँ फ़िज़ां में है फैला
धुँआ धुँआ सा ये !
आलूदगी का ज़हर है।💐

रवाँ रवाँ थी ज़िन्दगी
जिसकी सुबह शाम
अब क्यूँ गया ठहर है।💐

पुर अमन की हक़ीक़त
है अब जब यहां,
क्यूँ नहीं चेहरों पर
आता नज़र है।💐

अपनों ने ही अपनों को
दगा दे दिया
बे भरोसगी की हद
इस क़दर है।💐

पहले तो नहीं था मिज़ाज़
ये मेरे शहर का
अब लग गई किसकी
काली नज़र है।💐

ढूंढो जिसने फैलाई
है अफवाह शहर में
ढूंढता उसको हर बशर है।💐

कमलेश' ऐसा नहीं है
जैसा सोचते है लोग
ज़िन्दादिल दिलों का
शहर है।💐

देखना है तो इसको
अल सुबह देखो
कितनी खूबसूरत
इसकी सहर है।।💐

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018 | By: kamlesh chander verma

उल्फ़त में तेरी..।।

उल्फ़त में तेरी कोई ,भी सज़ा क़बूल है।
बे वजह ही सही कोई ,भी वज़ह क़बूल है।
ना शिकवा कोई तुमसे ,ना माथे पर कोई शिकन,
शिद्दत से  निभाना दोस्ती, अपना उसूल है।
जब हमने तुमको अपना, जहां समझ लिया,
फिर चाहत में शक़ के कंकड़, ढूंढना फ़िज़ूल है।
बिजलियाँ ज़माने की, हम पर गिरती रहीं मगर,
महफूज़ रहा फिर भी ,हमारी मुहब्बत
का मस्तूळ है।
तूफानों से लड़कर हम किनारा पा  ही जायेंगे,
नाज़ुक नहीं है इतना ,प्यार का खिला सहरा में फूल है।
कमलेश' है ख़ास ही मुहब्बत इस ज़िन्दगी से,
पर हमको तेरी खातिर ,हर सज़ा क़बूल है।।

गुरुवार, 30 अगस्त 2018 | By: kamlesh chander verma

लगा दो आग इस गुलशन में...!!

लगा दो आग इस गुलशन में
नही जिसकी तुमको ज़रूरत है।
शोलों की तपिश में देख ले
दुनिया
असल में क्या हकीकत है।।

ना कोई भाई चारा है आपस में
ना कोई भी नाता है ।।
हम हम की बू से भरा कचरा
हर तरफ नज़र आता है।।

कल तक जो हमराज़ हमसाया
बन कर बैठे थे।
लोग सबसे पूछते हैं आज
इनके आपस में कैसे रिश्ते थे।।

बस ज़रा सी बात को
अहम का सवाल बना डाला।।
जो बाग़ था एकता का
उसको जला डाला ।।

तो मिल कर फूक दो
अपनी विरासत बाप दादों की।
रहेंगे मिलकर हमेशा किये
उनके वादों की।।

सब एक जैसे हैं
कोई नहीं कुछ कम है।
कमलेश"नही ये सब झूठे हैं
इस ही बात का गम है।।

(हिन्दू मुस्लिम वैमनस्य से आहत।)