सोमवार, 27 जून 2011 | By: kamlesh chander verma

रिश्तों पर अविश्वास ....!!!

रिश्तों पर अविश्वास का बादल क्यों घना ,
ये थोड़े दिनों से या बहुत पहले बना है ,

सोचो में इतना संकुचन कैसे हो रहा है ,
या खुद खो रहे या विश्वास खो रहा है ,

क्या सामाजिक मूल्यों का अब वजूद नही है ,
दायित्वों के परिपालन के बावजूद नही है ,

कैसे समाज की संरचना बदल रही है ,
हर नवागंतुक ,विहाग को मचल रही है ,

शायद जो 'कमलेश 'हम सोच रहे हैं मन में ,
वह होना होता है सब के इस जीवन में

3 comments:

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बढ़िया...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

शायद जो 'कमलेश 'हम सोच रहे हैं मन में ,
वह होना होता है सब के इस जीवन में ॥
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बहुत सार्थक रचना रची है आपने!

परमजीत सिँह बाली ने कहा…

बढिया रचना।बधाई।