सोमवार, 23 जुलाई 2012 | By: kamlesh chander verma

दर्द को हंस कर ...!!!

कैसे बताऊँ उस दर्द को जो नासूर हो गया ,
दर्द को हंस कर सहने को , दिल मजबूर हो गया

वक्त अपनी ही चाल से कैसे,वक्त काट देता है यहाँ ,
वक्त जिसे समझे थे एक, उसको भी बाँट देता हैं यहाँ

दर्द को भी दर्द होता होगा जरूर एक बार जिन्दगी में ,
जब कोई दर्द बिछुड़ता होगा , उसकीअपनी जिन्दगी से

ना
हो उनको कोई अहसास ,कोई हमें फ़िक्र नही ,
कहीं अहसास ही ना ख़त्म हो जाये, बस फ़िक्र है यही

''कमलेश'' गुजारिस हैं कोई ना बदले रिश्तों के रूप को ,
लगे ना नजर किसी की , रिश्तों की चमकती धूप को .


2 comments:

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

bahut khub

Rajiv Sharma ने कहा…

दर्द को भी दर्द होता होगा जरूर एक बार जिन्दगी में ,
जब कोई दर्द बिछुड़ता होगा , उसकीअपनी जिन्दगी से ।

बहुत सुन्दर लेखन!

एक मर्मस्पर्शी कविता!