शनिवार, 17 सितंबर 2011 | By: kamlesh chander verma

अभी बेफिक्र हो के ना ज़नाब सोइए ...!!!

बेफिक्र हो के जनाब आप अभी ना सोइये ,
अभी जो जख्म हैं ताज़े ,उनको तो धोइये ,

ना समझो की गद्दार, सब खो गये हैं कहीं ,
सापों की मानिंद, बिलों में छुप गये हैं यहीं ,

ढूंढ-ढूंढ कर मारो, इन विष-भरे नागों को ,
तोड़ सके ना ये हमारे, एकता के धागों को ,

अब ना पनपने देंगे,हम गद्दारों की टोली को ,
रक्त-रंजित होने दें हम, ईद और होली को ,

'कमलेश 'हर मन में देश -प्रेम का बीज बोना होगा ,
सब होंगे सजग फिर बेफिक्र, हो के सोना होगा पर ..

बेफिक्र हो के जनाब आप अभी ना सोइये ,
अभी जो जख्म हैं ताज़े उनको तो धोइये ...,॥



2 comments:

S.N SHUKLA ने कहा…

sri VERMA JI
सुन्दर रचना के लिए बधाई स्वीकारें /
मेरी १०० वीं पोस्ट पर भी पधारने का
---------------------- कष्ट करें और मेरी अब तक की काव्य-यात्रा पर अपनी बेबाक टिप्पणी दें, मैं आभारी हूँगा /

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना!
बेफिक्री ठीक नहीं!
भूकम्प कभी भी आ सकता है!