सोमवार, 9 जनवरी 2012 | By: kamlesh chander verma

क्या ? ईमानदारी की .....कीमत चुकानी पड़ेगी !!!

क्या ? ईमानदारी को कीमत चुकानी पड़ेगी ,
झूठ से सच को मुहं की खानी पड़ेगी

इतनी धुंध छाई है झूठ की हर तरफ ,
सच्चाई को अपनी परछाई छुपानी पड़ेगी

जब हम बोलते हैं की सच है यही ,
उस सच की भी सच्चाई बतानी पड़ेगी

सौ बार कहने पर बन जाता है ''बछड़ा -मेमना ,
मतलब साख सच्चाई को भी गंवानी पड़ेगी

तलवार की धार बन कर रह गयी है सच्चाई ,
गर चलना है तो पैरों की चमड़ी कटानी पड़ेगी

मायूसी भरी रात में भी उम्मीदों के चिराग जलते हैं ,
क़ुरबानी के मोम से सच्चाई की लौ जलानी पड़ेगी

पतंगों के माफिक जान देकर शमां के लिये ,
बुझती हुई शमां को मशाल बनानी पड़ेगी

''कमलेश''जीत होती हमेशा रही है सत्य की ,
झूठ पर यही जीत भविष्य की निशानी बनेगी


2 comments:

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

वाह बहुत बढ़िया!
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!