गुरुवार, 10 जून 2010 | By: kamlesh chander verma

भीग जाती थी तेरी आँखें...!!!


भीग जाती थी तेरी आँखें, मुझे याद करके ,
तब क्यों देखा !तुमने मुझे जी भर के

जब सामने थी तो ,टिक सकी ये मुझ पर ,
अब क्यूँ करती हैं शिकवा, ये रह -रह करके

इनकी उल्फत का कोई ,सानी है इस जहाँ में ,
बसाये रखती हैं ये यादें ,अपने में मर करके

कौन समझे इन आँखों की, दीवानगी को ''कमलेश ''
भीगने
की अदा अता की, खुदा ने इनको जी भर के

8 comments:

सुनील दत्त ने कहा…

सुन्दर रचना है जी

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

waah kya ankho ki ada paish ki hai.kaabile tareef hai.

apki gazel kal 11/6/10 ke charcha manch k liye select ki gayi hai.

http://charchamanch.blogspot.com/

महफूज़ अली ने कहा…

बहुत सुन्दर गज़ल लिखी आप्ने ॥

दिलीप ने कहा…

waah sundar gazal...

Jandunia ने कहा…

इस पोस्ट के लिेए साधुवाद

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

सुन्दर रचना...

वाणी गीत ने कहा…

कौन समझे आँखों की इस दीवानगी को ...
वाह ...बहुत सुन्दर ....!!

वन्दना ने कहा…

्वाह्………बहुत सुन्दर्।