मंगलवार, 14 अगस्त 2012 | By: kamlesh chander verma

जिन हवाओ की कोई मंजिल .....!!!!


जिन हवावों की कोई मंजिल ना हो ,उनको यहाँ उतारा जाये ,
बिगड़ी हुई है जो शक्ल आईने की ,उसको जरा सुधारा जाये

जिन कानों में ना पहुँचती हो आवाम की थोड़ी भी आवाज ,
बताओ ?उनको किस नाम से , अब किस तरह पुकारा जाये

जलती तो है चिंगारी की लौ सबके रुई जैसे नाज़ुक दिल में ,
पर उसे कैसे ? धधकते अंगारों के मानिंद उभारा जाये

जो लोग समझते हैं हम एवरेस्ट पर, बैठे पहले से ही थे ,
उनको यथार्थ के धरातल पर, जबरदस्ती उतारा जाये

''कमलेश'' क्यों नहीं समझते की ,कर्म जग में करो ऐसा ,
नाम की वजह से नहीं, काम को याद कर पुकारा जाये ..