गुरुवार, 23 अगस्त 2012 | By: kamlesh chander verma

लगते हैं बेचारे हम ....!!!

 
हम चाहे तो आसमान को, टुकड़ों में तोड़ दें ,
 सागरों के मुहाने को, जिधर चाहे मोड़ दें

रौशनी की मोड़ देते हैं राह , उसकी ही राह में , 
बिजलियों को कैद कर दें ,उन्ही की सैरगाह में

मजाल है कोई चला जाये , हमारे मुहं पर बोलकर , 
सिंहों के भी दांत गिने हैं ,हमने मुहं खोलकर

फिर दुनिया को क्यों नही ,लोहा मनवा पाते हैं , 
नर्म ,अस्थिर ,धर्म-विभाजित 'राष्ट्र'क्यों कहलाते हैं ?

अब नवयुवकों को बदलना होगा , इस सड़े निजाम को,
'
कमलेश'अब निश्चय कर करो ,देश के इस काम को


2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

वाह क्या बात है...
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

राष्ट्र को समर्पित ...बहुत खूब