सोमवार, 28 फ़रवरी 2011 | By: kamlesh chander verma

क्यूँ खेलते हैं दिल से ...!!?


क्यूँ ?खेलते हैं दिल से ,इस जहाँ के लोग ,
ये इतने हैं बेदर्द !ये हैं कहाँ के लोग !!?

रखते नही लिहाज़ जरा भी, मुहब्बत के का ,
रुतबा दिखाते हैं हमेशा, अपने झूठे गरूर का

गर नही चला जाता था मंजिल--जानिब ,
तो क्यों ?मेरी तरफ हाथ बढ़ाना जरूर था

बस अपना हो मकसद हासिल,ये तेरी सोच थी ,
इसमें मंजिल का नही ! सोच 'का ही कसूर था

'कमलेश' देखेगी दुनिया प्यार के, नाम को इस तरह ,
कहेगी !! ये तो प्यार नहीं दिमागे-फितूर था

2 comments:

kase kahun?by kavita. ने कहा…

बस अपना हो मकसद हासिल,ये तेरी सोच थी ,
इसमें मंजिल का नही ! सोच 'का ही कसूर था ।bahut khoob....

kase kahun?by kavita. ने कहा…

बस अपना हो मकसद हासिल,ये तेरी सोच थी ,
इसमें मंजिल का नही ! सोच 'का ही कसूर था ।bahut khoob....