रविवार, 8 नवंबर 2009 | By: kamlesh chander verma

कहूँ मै क्या ..?

कहूँ मै क्या ?दिल उदास है ,
कोई ऐसी बात मौका खास है

कोने में कहीं दिल के किसी ,
इक उलझा -उलझा सा अहसास है

किसे समझूं यहाँ अपना ,
तोड़ देता हर कोई विश्वाश है

कसम से पड़ता इस अजाब में ,
हो गया सकूने -दिल का नाश है

फ़िर भी शुक्र है खुदा का ,
टुकडा टूटे दिल का मेरे पास है

'कमलेश' मिल जाएगा ही कोई,
अपना कोई कोई हमराह है

4 comments:

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

कसम से न पड़ता इस अजाब में ,
हो गया सकूने -दिल का नाश है

bahut sundar !!

M VERMA ने कहा…

फ़िर भी शुक्र है खुदा का ,
टुकडा टूटे दिल का मेरे पास है ।
शुक्र है अवशेष तो शेष है
बहुत सुन्दर रचना

Dr. Smt. ajit gupta ने कहा…

अच्‍छी रचना। क्‍या करे यहाँ भी दिल उदास है।

Suman ने कहा…

nice.........nice....................nie...................