मंगलवार, 24 जुलाई 2012 | By: kamlesh chander verma

रिमझिम -रिमझिम मेघ ....!!!


रिमझिम -रिमझिम मेघ बरसता ,गिरती बूँदें शाखों से ,
याद के बादल जब-जब छाये ,निर्झर निकला आँखों से ।

देख उमड़ते मेघों को ,मोर -मोरनी संग नाचे ,
पिया बसे परदेश जा, सजनी बैठी पाती बांचे ।

मौसम बैरी इस विरहन की ,मिलन की आग जलाये ,
आ जाओ इस विरह घड़ी में, बैठी हूँ आस लगाये ।

बहुत सुहाना मौसम है , वक्त बड़ा ही सुंदर है ,
मन की आँखों से तुम पढ़ लो , जो मन के अंदर है,

'कमलेश ''वर्षा -ऋतु में नव जीवन का संचार हुआ ,
हरी-भरी हो गयी धरती ,आनंदित सारा संसार हुआ ॥