गुरुवार, 12 जुलाई 2012 | By: kamlesh chander verma

टूटता नीड़ देख कर .....!!!!

देख कर नीड़ टूटता मेरा मन सिहर गया ,
वर्षोँ से सहेज़ा था जिसे पल में बिखर गया

यह
सुंदर घोंसला सम्मिलित प्रयासों की तावीर थी ,
अच्छी
परिश्रमी परिवार की सुंदर तस्वीर थी

पता
नही चलते -चलते रास्ते ,खुद ही मुड़ गए ,
पंछी
जिस डाल पर बैठे थे ,खुद ही उड़ गये

प्यार
की नींव क्यों, इक दम दरक गयी ,
जो
मजबूत थी इमारत फिर ,क्यूँ गिर गयी

कैसे
-कैसे इम्तिहान आते हैं, जिन्दगी के दौर में ,
इक
दम अँधेरा हो गया, जिन्दगी के भोर में

लोग
बदलें जमाना बदले,खुद को बदल लीजिये ,
गुजारिस है ''कमलेश'' मुझको, बदलने की कोशिश मत कीजिये