सोमवार, 3 जून 2013 | By: kamlesh chander verma

माँ , माँ होती है .....

इस   दुनिया  के हर दरख्त से कभी  घनी '' छाँ''  नही होती ,
दुनिया में कभी कोई और ,अपनी जैसी ''माँ''नही होती.

कहने को दुनियावी  रिश्तों के, अम्बार  लगे हैं होते ,
पर उनमे कहीं ममतामयी ,अपनी ''माँ'' नही होती .

रिश्तों को पिरोने का धागा ,और प्यार के मोती ,
न बनती ये रिश्तो की माला   जो ''माँ'' नही होती .

तेरे  जाने के बाद कैसे बिखर ,जायेगा तेरा उपवन ,
अच्छा है ! नही तू देख -देख  ''माँ''बहुत रोती .

हर तरफ़ रिश्तों का जनाज़ा ,माँ निकल रहा है ,
कब तक तुम अपने ''कंधों पर इस लाश को ढोती .

आखरी वक्त  ''तोड़'' दिए तार, रिश्तों  के जमाने ने ,
'कमलेश' 'माँ' न टूटती गर , सारे तार जोड़ लेती ....काश !!.....!!!!