रविवार, 8 अप्रैल 2018 | By: kamlesh chander verma

हम दिलजलों....!!

हम दिलजलों पर ,मत हंसों यारों,
कभी तो तुम्हारा भी ,दिल जला होगा।

ऐसे ही नहीं कोई बन जाता ,कवि और शायर,
इस दिल को ज़रूर, किसी ने छला होगा।

कितना भी बच कर चले ,हम ज़माने से,
कोई ना कोई इल्ज़ाम ,तो मिला होगा।

मर मिटे होंगे हम कभी ,मासूम सूरत पर,
जब तिरछी नज़र का ,तीर चला होगा।।

कोई नहीं है मुंसिफ ,हम जैसों के लिये,
सदियों से चलता आया ,ये सिलसिला होगा।
कोई मरहम बता दो इन ज़ख्मों के लिए
'कमलेश'का तो होगा ही ,आपका भी भला होगा।।

1 comments:

RADHA TIWARI ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (09-04-2018) को ) "अस्तित्व बचाना है" (चर्चा अंक-2935) पर होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
राधा तिवारी