शुक्रवार, 21 सितंबर 2012 | By: kamlesh chander verma

.फुर्सत में कभी अपने दिल को......

 फुर्सत में कभी अपने  दिल को ,समझाया कीजिये  ,
न खेले किसी के दिल से , इसे नसीहत  तो दीजिये । 

आदत में   है शुमार इसकी, या इसका शौक है ,
कभी-2 पड़ता है महंगा सौदा ,इसे समझाया तो  कीजिये । 

खिलौने की तरह तोड़  दिल ,क्यूँ इतराता है अपने आप पर ,
टूटे दिल जुड़ते हैं बमुश्किल ,ये इससे फरमाया तो कीजिये ।

उजड़ने को  उजड़ जाते हैं ,आबदे -चमन भी इसकी बेवफाई से  ,
इससे कहो  उजड़े चमन में किसी का आशियाँ भी बसाया तो कीजिये    । 

बिलखते  दिलों को देख क्या मिलता है  दिले-सकूं इसको ,
प्रेम -रस की कभी  ठंडी फुहार भी  बरसाया  तो कीजिये  । 

क्यूँ छुड़ा कर हाथ भागता है, किसीसे दूर ये अब ,
'कमलेश 'जो  हैं उलझने दी  इसने, उनको सुलझाया तो कीजिये..