बुधवार, 12 सितंबर 2012 | By: kamlesh chander verma

कैसा है विद्रूप रूप अभिव्यक्ति की आज़ादी ..

कैसा है विद्रूप रूप अभिव्यक्ति की, आज़ादी का  ,
कहीं षड्यंत्र तो नही है ये  ,अधिकारों की बर्बादी का। 

प्रजातंत्र के नाम को लेकर, ये क्या-2  करते हैं ,
अपनी तिजोरियां भरते हैं ,आम-जन भूखो मरते हैं। 

मन की पीड़ा के निरूपण को जब , कलम-कूची की धार  चली ,
 लोक-तन्त्र की  दे दुहाई उन पर ही , कानूनी  तलवार चली। 

पर जिनके मन है प्रेम-विक्षोभ  उनको,इनकी  परवाह  नही ,
होने को महिमामंडित ;राजतन्त्र' से, उनको कोई चाह  नही। 

सारा देश जगाने को वो ,  अग्नि-पथ पर चलते जाते हैं ,
 कोई कविता की रचना करते हैं ,कोई ;कार्टून 'बनाते हैं।

' ये  क्यों नही समझते ;कमलेश' इनके मन का  मर्म नही ,
जो ली है जिम्मेदारी निभाने की ,क्या? ये इनका धर्म नही।।