गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010 | By: kamlesh chander verma

वाह जनाब क्या ??जमाने के दस्तूर बदल गये ..!!

वाह !! ज़नाब क्या ?जमाने के दस्तूर बदल गये ,
तेज चलने वालों से आगे आलसी निकल गए

माद्दा नहीं था जिनमे अपने घर तक जा सकें ,
आज वो मिजाज- -पुर्शी को सियाचिन निकल गए

जो देते रहे नसीहत उम्र भर जमाने को ,
जब देखी खनक हनक-- हुश्न वो भी मचल गये

बेदाग था दामन जिनका रुसवा हो गये जमाने में ,
बदनाम--जमाना शख्स पहले ही सम्भल गये

'कमलेश'क्या बदला है जमाने ने अपना रंग ,
जिनको जाना था 'कल'वो आज ही निकल गए

1 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

सुन्दर रचना!
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मंगलवार के साप्ताहिक काव्य मंच पर इसकी चर्चा लगा दी है!
http://charchamanch.blogspot.com/