बुधवार, 21 अप्रैल 2010 | By: kamlesh chander verma

मन का दर्द ...???



  • भाव विह्वल सजल नैनो में, अवसाद भरा ,
  • कांपती है आत्मा थर्राती है नभ-धरा

  • कैसी अनहोनी घटित हुई ,है जीवन में ,
  • मात्र पात के स्पंदन से भी है ,ये!मन डरा ,

  • सदियों की बातें करता रहा मै सदा ,
  • सब कुछ विलुप्त हो गया ,
  • बस पलक झपकी थी जरा ,

  • क्यों नहीं भाता कोई आश्वासन मन को ,
  • अब सम्वेदना का स्वर भी लगता है खुरदरा ,

  • काश !पढ़ पाते उस के लिप्यांतर को कभी ,
  • तो आज होता इतना खुद का मन भरा ,

  • अब भी वक्त है सोच ले ये नादाँ ''कमलेश ''
  • बस नाम का करले ...सौदा इकदम खरा-खरा

6 comments:

ललित शर्मा ने कहा…

आओ अवसाद छोड़ो,कुछ उल्लास की बातें करें
एक दी्प जलाएं प्रीत का,उजास दिन रातें करें

कमलेश जी,
अब एक गीत कविता संयोग या श्रृंगार हो जाए
तो आनंद आए।:)

M VERMA ने कहा…

मन का दर्द बहुत है गहरा
इंसान कितन है डरा-डरा

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बेहतरीन कमलेश भाई..ललित भाई के साथ साथ हम भी अपनी मांग रखते हैं. :)

Shekhar Kumawat ने कहा…

बहुत सुंदर

bahut dard chhipa he is dil me

bahut khub


shekhar kumawat


http://kavyawani.blogspot.com/

महफूज़ अली ने कहा…

प्रभावशाली अभिव्यक्ति के साथ.... बहुत सुंदर रचना....

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना है ! मन को मोह लिया ! बधाई !
सदियों की बातें करता रहा मै सदा ,
सब कुछ विलुप्त हो गया,बस पलक झपकी थी जरा ,
वाह ! क्या बात कह दी आपने !