रविवार, 31 अक्तूबर 2010 | By: kamlesh chander verma

जब भी हुआ इशारा ...!!!


जब भी हुआ इशारा, उस परवर -दिगार का ,
बरसीं रहमतें आसमां से ,झरना बहा प्यार का
उसकी रज़ा से दिए आँधियों में जलते हैं ...
हो ना रजा तो मजाल जाये झोंका 'बयार का ''
ये चमकती शबनम चहकती बुलबुल ,है उसी का नज़ारा ...
उसके इशारे से पत्थरों में , चहक रहा दरख्त चिनार का
समंदर भी सूख जाये जब वो चाहे तब ......../
नहीं संभल पाता इन्सान बोझ अपने दरो-दीवार का ''
कमलेश ''वो ही जाने उसकी कायनात का जलवा ,
बस बनी रहे इनायत है सपना इस खाकसार का ''॥

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

सुन्दर रचना!
--
इशारे जो समझ जाए उसे इन्सान कहते हैं!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

खूबसूरत रचना