शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010 | By: kamlesh chander verma

हम कब के मर गये थे ...!!!


हम कब के मरगये थे तेरे प्यार मे ,
अदायगी
रसमे -जनाज़ा तो है ज़माने की,

पता चल गया होता बहुत पहले,
पर
तूने कसम दी थी ना बताने की ,,

बन गयी थी जिंदगी एक बेजान बुत जब हमने ,
आहट
सुनी थी किसे बेगाने की,,

जिंदगी
हो गयी थी मौत पर भारी ,
जब
आया था वक़्त ,प्यार मे मिट जाने की,,

जिंदगी देख कर मरी फिर एक बार ,
जब तेरी बेताबी दिखी परायी बाहों मे सिमट जाने की ,,

'
कमलेश' मैने खुद ही मूंद ली आँखें , क्यूँ की ,
तुमने कर दी थी तैयारी मेरे मर जाने की,,

8 comments:

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

हम कब के मरगये थे तेरे प्यार मे ,
अदायगी रसमे -जनाज़ा तो है ज़माने की,


पता चल गया होता बहुत पहले,
पर तूने कसम दी थी ना बताने की ,,

पहली चार पंक्तियों ने ही दिल को छू लिया !

संजय भास्कर ने कहा…

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

संजय भास्कर ने कहा…

ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है

M VERMA ने कहा…

पता चल गया होता बहुत पहले,
पर तूने कसम दी थी ना बताने की ,,

आज ये कसम क्यो तोड दी
सुन्दर रचना

Dev ने कहा…

सही है, यू तो बिना इश्क के जिंदगी बेकार है और जब इश्क हो तो कमबख्त जीने नहीं देता

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बढ़िया शेर लगाये हैं!

PRATUL ने कहा…

बेपनाह मोहब्बत है जिससे भी है। लाजवाब भाव ...

मेरे भाव कुछ इस तरह से रहे ...

"किसी के तीसरे के सामने / स्पष्ट कर देना / प्रिय और स्वयं के / मध्य की गोपनीयता / अपराध है किसी को छेड़ने जैसा।

यह अपराध मैं भी कर चुका हूँ / स्पष्टवादी बन्ने के चक्कर में / कर चुका हूँ प्रायश्चित / प्रत्येक स्पष्टीकरण के बाद।

Pratul Vasistha ने कहा…

बेपनाह मोहब्बत है जिससे भी है। लाजवाब भाव ...



मेरे भाव कुछ इस तरह से रहे ...



"किसी के तीसरे के सामने / स्पष्ट कर देना / प्रिय और स्वयं के / मध्य की गोपनीयता / अपराध है किसी को छेड़ने जैसा।



यह अपराध मैं भी कर चुका हूँ / स्पष्टवादी बन्ने के चक्कर में / कर चुका हूँ प्रायश्चित / प्रत्येक स्पष्टीकरण के बाद।