बुधवार, 17 अप्रैल 2013 | By: kamlesh chander verma

''नफरत है''...!!!

''नफरत है'' मुझसे जताना ,उनका इक बहाना था ,
छुड़ा कर मेरा पहलू,बेगाने आगोश में जाना था .


कल तक जिनको मेरे बगैर, जीना था ,मुश्किल.
नही ज़रुरत है ' उस गोली का मै ही निशाना था.

न बनाते ख्वाबों की मंजिलें, मुस्तकबिल के मुहाने पर ,.
क्यों करते यूँ ही जाया .,जो वक्त मेरा सुहाना था।

इम्तिहानों के दौर चले कितने ,तुझको पाने के वास्ते , 

वो थी तेरी चाहत ,या महज़ फ़साना था। .

'कमलेश ' की है दरिया दिली ,या उनकी बदनीयत ,
अब ही टूटना अच्छा ,जिसने इक दिन टूट जाना था..

3 comments:

रविकर ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति
शुभकामनायें आदरणीय ||

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

आज की ब्लॉग बुलेटिन गुड ईवनिंग लीजिये पेश है आज शाम की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

तुषार राज रस्तोगी ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना | आभार

अत्यंत सुन्दर और भावपूर रचना विकेश भाई | शुक्र है किसी ने तो सोचा ऐसों के बारे में | ईश्वर उन्हें शांति प्रदान करे | आभार

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