गुरुवार, 20 जून 2013 | By: kamlesh chander verma

मटक- मटक कर चलती है....!!!

मटक -मटक कर चलती है ,राह  भटक कर चलती है ,
बस मन में इक उल्फत है ,बस वो मुझको  छू जाये ...१ 

चाहे बदन छिल जाए ,सारे  अरमां निकल जाएँ ,
 अंज़ाम चाहे  कैसा हो ,बस वो मुझको छू जाये ....२ 

खिल जायेगा  मेरा चेहरा ,जब होगा उसके सर सेहरा ,
ज़रूर बजेगी  शहनाई   , बस वो मुझको छू जाये …. ३ 

कहे कुछ भी सोचे ज़माना ,उस ओर  नहीं  हमने  जाना ,
मिल जायेगा   दुनिया का खजाना ,बस वो मुझको  छू जाये ....४ 

''कमलेश'' मेरी ये फितरत है ,किसी को क्यों नफरत है ,
चाहे कुछ भी हो जाये ..,बस वो मुझको  को छु जाये।। .....५


3 comments:

vandana gupta ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(22-6-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!

कालीपद प्रसाद ने कहा…

चाहे बदन छिल जाए ,चाहे अरमां निकल जाएँ ,
चाहे अंज़ाम कैसा हो ,बस वो मुझको छू जाये ....२
चाहे कुछ भी हो जाए ...बस वो मुझको छू जाये
latest post परिणय की ४0 वीं वर्षगाँठ !

राजेंद्र कुमार ने कहा…

बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुतिकरण,आभार।