गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010 | By: kamlesh chander verma

कोशिशें तमाम की उनसे...!!

कोशिशें तमाम की उनसे मुलाकात की ,
तासीर --कशिश समझे वो जज्बातकी । .......

गर्दिश में हों सितारे तो ,हर कोशिश नाकाम है ,
जलाते उनकी यादों के दिए ,बीती हर शाम है ,
कभी रौशनी उन तलक पहुंचेगी इस बात की .........

बुझती उम्मीदों को अपनी बाँहों का सहारा दे दो ,
बुझने से पहले जाने का बारीक़ इशारा देदो ,,
कसम है उन लम्हों की ,कसम है तुझे उस रात की ........

मिट जाएगी यह हस्ती ,तेरे दीदारे जुनू में ,
जाएगा जम तेरा नाम दिल के थमते लहू में ,,
पैगामे-दिल जो लिखा तेरे वास्ते ,बहा के ले गयी झड़ी बरसात की ...............


'कमलेश' हसरत बाकी है लबों पर अब तलक ,
गवाही भरतें हैं , जमीं आसमां ओर तारे फलक ,,
मिल जाओ तडपाओ अपने प्यार को ,अब जिद भी है किस बात की ...................

5 comments:

निर्मला कपिला ने कहा…

कोशिशें तमाम की उनसे मुलाकात की ,
ताशीरे-ए-कशिश न समझे वो जज्बातकी । ...
वाह लाजवाब प्रस्तुति बधाई

अनिल कान्त : ने कहा…

achchhi rachna main kuchh khaas hota hai jo khud se baandh leti hai.

maine khud ko bandhan mein paya

Mithilesh dubey ने कहा…

लाजवाब व बेहतरीन लिखा है आपने ।

Udan Tashtari ने कहा…

ताशीरे-ए-कशिश

इस तरह के शब्दों के अर्थ भी डाल दिया करिये तो सभी के लिए सुगमता होगी. निवेदन मात्र है.

बाकी तो हमेशा की तरह उम्दा रचना.

Suman ने कहा…

कमलेश' हसरत बाकी है लबों पर अब तलक ,
गवाही भरतें हैं , जमीं आसमां ओर तारे फलक ,,
मिल जाओ न त्ड्फाओ अपने प्यार को ,अब जिद भी है किस बात की.nice