शुक्रवार, 29 जनवरी 2010 | By: kamlesh chander verma

दिल के अरमानो को...!!!

दिल के अरमानो को गर अल्फाज़ मिले होते ,
आज जमाने के रूबरू लब सिले होते

लग ही जाता पता दिल--दर्द जमाने को ,..
संग दिल भीड़ के सामने लब हिले होते

शुक्र - गुजार होता उन बेगानों का,
अपनों से कोई शिकवे -गिले होते

अपनी मंजिल मिल जाती खद--खुद ,
खुली बाँहों को दो हाथ और मिले होते

'कमलेश 'बद्ल जाते रस्मों -रिवाज़ दुनिया के ,
शुरू अरमानों को अल्फाज़ देने के सिलसिले होते

5 comments:

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

शुक्र - गुजार होता उन बेगानों का,
न अपनों से कोई शिकवे -गिले होते ।

अपनी मंजिल मिल जाती खद-ब-खुद ,
खुली बाँहों को दो हाथ और मिले होते ।

Bahut sundar !

Suman ने कहा…

अपनी मंजिल मिल जाती खद-ब-खुद ,
खुली बाँहों को दो हाथ और मिले होते ।nice

HINDU TIGERS ने कहा…

अति उत्तम भाई

HINDU TIGERS ने कहा…

अति उत्तम भाई

Rajiv Sharma ने कहा…

उत्कृष्ट रचना