शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018 | By: kamlesh chander verma

मिलता हूँ रोज़ खुद.....

मिलता हूँ रोज खुद से,पर मुलाकात नही होती।
मिलती हैं नजरों से नजर ,पर बात नही होती ।

बन कर अज़नबी जी रहे हैं ,दोनों बरसों से।
पर चाह कर भी हममे ,कोई बात नही होती।

कभी तो लगता है अनजाने ,हो गये है ये आसमाँ-जमीं,
इन्सान हो गया  खुद अपने से ,कितना अज़नबी।

'कमलेश' आज हम सब से  मिलेंगे ,ये तो बस ख्याल है।
जब हम खुद से मिलेंगे वो जरूर ,चांदनी रात होगी।।

#Kamlesh Verma