रविवार, 7 फ़रवरी 2010 | By: kamlesh chander verma

शरद ऋतु के होते..!!

शरद ऋतु के होते , अपने अलग ही रंग ,
मन प्रफुल्लित हो झूमता ,प्रिय प्रियवर के संग

मीठी-मीठी ठंडक, तन को प्यारी लगती है ,
जो धूप तडफती थी ,वो भी प्यारी लगती है

भूल गये वो गर्मी के दिन ,जब धरती रही धधकती ,
जिन चिड़ियों की जान फंसी थी ,वो भी फिरे फुदकती

हर है सुहावना मौसम ,सवेर लगे बड़ीप्यारी ,
ये फसल कटी अब, अगली की हो गयी तैयारी

इस प्रकृति के अनुपम उपहार को हमें बचाना है ,
'कमलेश' हर तरफ इस धरा को ,विर्क्षों से सजाना है

1 comments:

Vj ने कहा…
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