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बुधवार, 15 मई 2013 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

क्यों पंछी हुआ उदास...!!! पलायन का दर्द ?..

क्यों पंछी हुआ उदास ,अपना नीड़ छोड़ कर ,
जिसे  संजोया था ,तिनका -तिनका जोड़ कर। 

न किया गिला किसी से ,न शिकायत किसी की ,
चुप-चाप उड़ चला वो ,अपनी पीड़ ओढ़कर। 

मुड़ के देखा तो था , पड़ा बिखरा हुआ अतीत ,
पर जा रहा था वो,कुछ सच्चे रिश्ते तोड़ कर। 

खट्टी-मीठी यादे चल रहीं थी ,चलचित्र की तरह ,
दिल करता था  देखता रहे, चित्रों को जोड़ कर। 

टीस सी उठ रही है दिल में , उस  दर  को छोड़ते ,
है! इल्तिजा वक्त से ,ले आये वो  ''वक्त'' मोड़ कर।

'कमलेश'कहते हैं ये सब ,किश्मत का रचा खेल है ,
कभी कौन ? शौक से गया है ,अपना ''नीड़ ''छोड़ कर।।


मंगलवार, 2 अगस्त 2011 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

सावन का मौसम ....!!

पतझड़ों को हमेशा सावन की दरकार होती है ,
इक बार नही जीवन में बारम्बार होती है ,

इस सावन की ले ओट कहीं प्रेम पुष्प खिलतें हैं ,
पा कलियों की स्निग्ध छुवन मतवाले हो फिरते हैं ,

प्रेमातिश्योक्ति जब भंवरों में अति भर जाती है ,
ले सायं काल गोद में अपनी कली खुद भी मर जाती है
,

इस मौसम की रंगीनी में सब कुछ सुहाना होता है ,
जो कली रही अध् -खिली ,उसका भी अफसाना होता है ,

सावन की इस मस्ती को ,जीवन में hd तक उतार लो ,
,कमलेश ' गर ख़ुशी कम पड़े ,तो किसी से बे-शक 'उधार ' लो..
.........

पतझरों को हमेशा सावन की दरकार होती है ,
इक बार नही जीवन में इनको बारम्बार होती है