मंगलवार, 2 अगस्त 2011 | By: kamlesh chander verma

सावन का मौसम ....!!

पतझड़ों को हमेशा सावन की दरकार होती है ,
इक बार नही जीवन में बारम्बार होती है ,

इस सावन की ले ओट कहीं प्रेम पुष्प खिलतें हैं ,
पा कलियों की स्निग्ध छुवन मतवाले हो फिरते हैं ,

प्रेमातिश्योक्ति जब भंवरों में अति भर जाती है ,
ले सायं काल गोद में अपनी कली खुद भी मर जाती है
,

इस मौसम की रंगीनी में सब कुछ सुहाना होता है ,
जो कली रही अध् -खिली ,उसका भी अफसाना होता है ,

सावन की इस मस्ती को ,जीवन में hd तक उतार लो ,
,कमलेश ' गर ख़ुशी कम पड़े ,तो किसी से बे-शक 'उधार ' लो..
.........

पतझरों को हमेशा सावन की दरकार होती है ,
इक बार नही जीवन में इनको बारम्बार होती है


1 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

हरियाली तीज के अवसर पर अच्छी रचना लिखी है आपने!