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बुधवार, 15 मई 2013 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

क्यों पंछी हुआ उदास...!!! पलायन का दर्द ?..

क्यों पंछी हुआ उदास ,अपना नीड़ छोड़ कर ,
जिसे  संजोया था ,तिनका -तिनका जोड़ कर। 

न किया गिला किसी से ,न शिकायत किसी की ,
चुप-चाप उड़ चला वो ,अपनी पीड़ ओढ़कर। 

मुड़ के देखा तो था , पड़ा बिखरा हुआ अतीत ,
पर जा रहा था वो,कुछ सच्चे रिश्ते तोड़ कर। 

खट्टी-मीठी यादे चल रहीं थी ,चलचित्र की तरह ,
दिल करता था  देखता रहे, चित्रों को जोड़ कर। 

टीस सी उठ रही है दिल में , उस  दर  को छोड़ते ,
है! इल्तिजा वक्त से ,ले आये वो  ''वक्त'' मोड़ कर।

'कमलेश'कहते हैं ये सब ,किश्मत का रचा खेल है ,
कभी कौन ? शौक से गया है ,अपना ''नीड़ ''छोड़ कर।।


शुक्रवार, 20 अगस्त 2010 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

जुदाई ,...!!!


दीया जलता रहा मेघ बरसते रहे ,
उनके दीदार को नैन तरसते रहे

जा बसे हो जब से पिया तुम परदेश में ,
नैन इक-इक पल उसी राह में भटकते रहे

कैसी टीस उठती है इस दिल के जख्म में ,
दर्दे-जुदाई में रात-दिन बिलखते रहे

जोडती हूँ माला बिताये लम्हों की मै सदा ,
पर जितने ये जुड़ते उतने ही बिखरते गए

तेरी सूरत की इस दिल पर गहरी छाप है ,
धुंधली यादों के साए भी निखरते रहे

''कमलेश''उम्मीद है तुम जल्दी घर जाओगे ,
दूर हो जाएँगी तन्हाईयाँ मिटेंगे सन्नाटे जो पसरते रहे