शुक्रवार, 20 अगस्त 2010 | By: kamlesh chander verma

जुदाई ,...!!!


दीया जलता रहा मेघ बरसते रहे ,
उनके दीदार को नैन तरसते रहे

जा बसे हो जब से पिया तुम परदेश में ,
नैन इक-इक पल उसी राह में भटकते रहे

कैसी टीस उठती है इस दिल के जख्म में ,
दर्दे-जुदाई में रात-दिन बिलखते रहे

जोडती हूँ माला बिताये लम्हों की मै सदा ,
पर जितने ये जुड़ते उतने ही बिखरते गए

तेरी सूरत की इस दिल पर गहरी छाप है ,
धुंधली यादों के साए भी निखरते रहे

''कमलेश''उम्मीद है तुम जल्दी घर जाओगे ,
दूर हो जाएँगी तन्हाईयाँ मिटेंगे सन्नाटे जो पसरते रहे