गुरुवार, 6 सितंबर 2012 | By: kamlesh chander verma

जल्लादों के शहर में अहसासों,......!!!

जल्लादों के शहर में अहसासों, का मोल क्या ? है ,
जहाँ मुफलिसी हो शर्मिंदा ,वहां सांसों का मोल क्या?है।

जिनके मनों में अँधेरा हो बेरुखी का, मुद्दतों से छाया ,
उधर चिरागे-मुहब्बत जलाने में, झोल क्या? है।

जब तक नहीं दिखती गुरबत ,उनको, दिल की आँखों से ,
फरियादों की मशालों को जलाने का, मोल क्या ?है।

उनके आंसूओ में जिनको दीखता, साफ-सफ़ेद पानी ,
आँखों में उनकी इन जज्बातों का, बताओ मोल क्या? है।

जहाँ शर्मिंदा होती है जिंदगी जिनकी, सरपरस्ती की छाँव में ,
भ्रष्टाचार के बाग में राजनितिक ,दरख्तों का मोल क्या?है।

''कमलेश''जहाँ छुपकर सूरज , निकलता हो अँधेरे से ?
उस महातिमिर को दूर करने में, 'जुगनुओं' का मोल क्या? है।।


1 comments:

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

हर शे का मोल हैं ..सिवा इंसान के