मंगलवार, 8 जून 2010 | By: kamlesh chander verma

आज तक ....!!! नही मिली ..


आज तक वो नही मिली ,जिसकी दरकार थी ,
झूठी निकली मेरी तमन्ना ,पीड़ मिली हार बार थी

तिनका -तिनका जोड़ परिंदों ने, घर अपना बना लिया ,
ना मिला कोई मेरे घर को,वैसे इनकी भरमार थी

जब तक उसने मुड कर देखा ,तब तक हम दूर थे ,
मुड कर उन तक जा ना सके ,पैर बहुत मजबूर थे

जिसको लेकर वो उलझे थे ,उनकी ग़लतफ़हमी थी ,
जिसे वो जीत समझे थे , वास्तव में उनकी हार थी

''कमलेश''इन उल्फतों को क्या नाम देंगे आप सब ,
जिसे आप समझ बैठे ''हाँ ''वह उनकी इंकार थी !!

9 comments:

आचार्य जी ने कहा…

आईये जानें ....मानव धर्म क्या है।

आचार्य जी

ललित शर्मा ने कहा…

''कमलेश''इन उल्फतों को क्या नाम देंगे आप सब ,
जिसे आप समझ बैठे ''हाँ ''वह उनकी इंकार थी !!

वाह वाह वाह बेहतरीन

दिलीप ने कहा…

waah bahut khoob...

संजय भास्कर ने कहा…

कविता मन मोहती है....सरल भाव दिल पर अपना असर छोड़ते हैं...

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत सुंदर !
कविता को एक नए अंदाज़ में परिभाषित किया है आप ने !

महफूज़ अली ने कहा…

बहुत सुंदर ग़ज़ल... हमेशा की तरह लाजवाब....

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

खूबसूरत अभिव्यक्ति

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

खूबसूरत अभिव्यक्ति

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सुन्दर रचना!
इसकी तो चर्चा "चर्चा मंच" में भी है!