शुक्रवार, 4 सितंबर 2009 | By: kamlesh chander verma

चलो उठ जाओ !!!

"छोड़ो आलस , जोड़ो साहस, कर लो सपने पूरे ;

करलो हठ, हो प्रकट कोई, रहना जाएँ अधूरे ;

तुम मोड़ दो, अपनी किस्मत की , नाव को;

त्याग दो जिन्दगी से, मनहूसियत के भाव को ;

करो अच्छे कर्म, इस जीवन में;

यही तुम्हारी थाती है ;

कर्म अनुरूप करेंगे याद तुम्हें ;

दुनिया तो आती जाती है;

सपने तो सपने होतें हैं , कहती दुनिया सारी
;
पर असली दुनिया से , लगे सपनों की दुनिया प्यारी ;

सपनो में भी, दुःख कलेश पड़ जातें हैं ;

पर जब भी खुली आँख ,एकदम उड़ जाते हैं ;

दिल फूटे जब , सपना टूटे ;

बिखरे दर्द चहूँ रे ;

ये जगबीती की बात नही , " कमलेश " बेदर्द कहूं रे ।।


2 comments:

mehek ने कहा…

सपनो में भी, दुःख कलेश पड़ जातें हैं ;
पर जब भी खुली आँख ,एकदम उड़ जाते हैं
dil ko nayi umango se bhar denewali,asman ko haasil karne ki chah mann mein jaganewali sunder kavita.

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा!!