शनिवार, 5 सितंबर 2009 | By: kamlesh chander verma

अहसास.!!?


शिद्दत से आई तेरी याद ,

हवा चलने लगी ,

सर्द बाँहों के अहसास से ,

बर्फ पिघलने लगी .

कुछ पल रहा दिल को यकीं ,
पर हकीकत ,खलने लगी ,

जिस को समझ बैठे ,अपना ,
उठा के वो सामां, चलने लगी

2 comments:

Mithilesh dubey ने कहा…

जिस को समझ बैठे ,अपना ,
उठा के वो सामां, चलने लगी

वाह बहुत बढ़िया!

Udan Tashtari ने कहा…

बहुतखूब!