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गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

जब-जब जनता के लबों पर...!! IAC SUPPORT

जब-जब जनता के  लबों पर ताले लगेंगे ,
फिर हर गली में उनको तोड़ने वाले मिलेंगे। 

हक है सबको  बोलने कोई खैरात नही है ,
छीन ले यह आज़ादी किसी की औकात नही है। 

अपनी हद में रह कर सभी अच्छा आचरण करें ,
जो भी हैं आपत्तियां उनका उचित निराकरण करें।

पर न हो जुल्म ;पार्टी' भक्ति के नाम पर ,
हो न काली  नजर उनके सही काम  पर।
उनकी हदों को भी रोकने वाले मिलेंगे .........जब-जब 

जबरदस्ती तो न बैठती चिड़िया किसी डाल  पर ,
नही कोई समझौता होगा आजदी के सवाल पर। 
अब भी तैयार हैं तमाचा खाने को गाल पर ,
पर दूसरों को भी अपने गाल सहलाने पड़ेंगे ....जब -जब 

'कमलेश'हक मांगता है  देश कोई भीख नही ,
'हम तो कानून को मानते हैं ,देते कोई सीख नही,
पर अपने लिए भी  सही कानून बनाने पड़ेंगे।।।।जब-जब 
सोमवार, 15 अक्टूबर 2012 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

जन सरोकारों की अनदेखी सरकारों का...!!!

जन सरोकारों की अनदेखी सरकारों का  फैशन हो गया ,
जन आंदोलनों को दबाना सरकारों का पैशन हो गया। 

दमनकारी नीतियों से कोई जन तन्त्र चलता नही ,
 जनआक्रोश  कुचलने से गण -तन्त्र  फूलता फलता नही. 

आप उनकी भी सुनो जिन्होंने तुमको  अपना नेता चुना है ,
पर अफ़सोस आपने इनको ही फंसाने  का फंदा बुना है। 

अब शायद नही चल पाएंगे  राजनीती के उलटे पांसे ,
होश में आओ कहीं आना न पड़े वापस वहाँ [संसद] से। 

जो हक है आम आवाम का आप उसका  उसको दीजिये ,
करके गहन समीक्षा सबकी  फिर मंत्रिमंडल में लीजिये. 

भडकाओ न जज्बातों की दिलों में जो छुपी आग है ,
क्यों की वर्तमान राजनीती की चादर में दाग ही दाग है। 

'कमलेश'राजनीति का खेल अब इक  प्रहसन हो गया है ,
जन सरोकारों की अनदेखी सरकारों का फैशन हो गया।।
शनिवार, 18 जून 2011 | By: कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹

हो समय प्रतिकूल तब वक्त भी ठहर जाता है ..!!

हो समय प्रतिकूल तब वक्त भी ठहर जाता है ,
वक्त[सत्ता]के सम्मुख जन-तन्त्र बे-बस नजर आता है ,

मन में तमन्ना रखते हैं जमाने को बदलने की ,
पर ये जान देने का ही रास्ता नजर आता है ,

कैसी मिलेगा इंसाफ इस सड़ी व्यवस्था से ,
यहाँ हर मोड़ पर भ्रष्टाचार का गटर नजर आता है ,

भ्रष्टाचार से भ्रष्टाचार का फलता-फूलता ये म्हातंत्र,
इस जहाँ से उस जहाँ तक विस्तार नजर आता है

इक कोशिस करके देखो ,ज़रूर मेरे यारों ,
क्यूंकि 'बापू 'का इसमें मूल मन्त्र नजर आता है

हो ना हो भड़केगी चिंगारी इन सोये दिलों में भी,
ऐसे ज़ज्बे का जोश ,हममे कभी-कभार नजर आता है

कोई नेता ,नौकर- शाह क्यों चाहे इस जन-लोकपाल को ,
इसमें भ्रष्टों को भ्रष्टाचार पर ,अत्याचार नजर आता है

कमलेश',अभी तो काली अँधेरी रात है नजर आती ,
पर उस तरफ वक्त के, खुशियों का त्यौहार नजर आता है