रविवार, 13 जनवरी 2013 | By: kamlesh chander verma

कब तक करूं मै इंतजार, तेरे ज़वाब का.....!!!!

कब तक करूं मै इंतजार, तेरे ज़वाब का ,
कहीं चेहरा ही न बदल जाये, मेरे ख्वाब का।

पहले तो नहीं थी सुर्खरू ,प्यार की शिद्दत इतनी ,
उलझन बढ़ी  जब चर्चा हुई ,तेरे मेरे  इंतखाब का।  .

गर दिल को बना लेते जुबाँ ,अल्फाज़ सज़ा लेते ,
ना होता ज़माने को इंतजार ,तुमसे किसी ज़वाब का।

ना होती सरे बाज़ार  रुशवा,हमारी  मुहब्बत इस तरह ,
गर सलीके से किया होता 'एहतराम' फर्ज़े -हिज़ाब  का।

'कमलेश' था खुली किताब ,कोई भी पढ़ लेता कभी ,
पर तुमने बना  दिया  इसे भी, 'पन्ना' बंद किताब का।।

6 comments:

रविकर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति |
प्रभावी कथ्य |
आभार ||

रविकर ने कहा…

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति सोमवार के चर्चा मंच पर ।। मंगल मंगल मकरसंक्रांति ।।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
मकर संक्रान्ति के अवसर पर
उत्तरायणी की बहुत-बहुत बधाई!

Reena Maurya ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन भावपूर्ण गजल...

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

सुंदर भावमयी रचना

mridula pradhan ने कहा…

bahut achchi lagi.....