शुक्रवार, 20 अगस्त 2010 | By: kamlesh chander verma

किससे करुँ मै...!!!

किससे करूं मै बात ,उन जनाब की


किससे
करूं मै बात ,उन जनाब की
जिनसे की है मुहब्बत बे-हिसाब की

दीखते नही वो दिन में ,रातें भी स्याह हुई

हुई मद्धम रोशनाई मेरी वफ़ा--महताब की

किससे गिला करूं कहाँ तहरीर दूं ?
कोई ढूंढ लाये तस्वीर मेरे ख्वाब की

बिखर जाएगी शर्मो -हया इस जहाँ में

जो बरसों से हिफाजत में है हिजाब की

..कमलेश

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर गज़ल है!

महफूज़ अली ने कहा…

सच में आपकी रचनाएँ तो दिल को छू लेती हैं...