गुरुवार, 5 नवंबर 2009 | By: kamlesh chander verma

तुम्हारी नजरों को...!!!


तू समझे मेरे प्यार को ,तो मेरा क्या कसूर ,

कोशिस तो की बहुत, पर समझे हजूर ?

आँखें तो देती रहीं ,हमेशा पैगाम आपको ,

तुम्हारी नजरों को लगा ,मुझ पे छाया है सरूर

ऐसी भी क्या बेरूखी ,मुझसे है आपको ,

आँखों ही आँखों में सोचते ,चले गये हो कितनी दूर

कमलेश बस इल्तिजा है,मेरी इक आप से ,

बस आते जाते इक नजर ,इधर डालो जरूर