शनिवार, 10 अप्रैल 2010 | By: kamlesh chander verma

अरमानो के महल ...!!!

मेरे अरमानों !के महल कब के ढह गये ,
और वक्त की लहरों के संग बह गये ,

क्या इतनी कच्ची थी मेरे प्यार की नीवं ,
जमाने के थपेड़े भी इससे सहे गये

सच्चे प्यार से बनाते गर आशियाने अपने ,
जो आये थे बर्बाद करने वो यहीं रह गये

अब भी वक्त है संभालो अंजुमन अपनी ,
जाते हुए तूफ़ान ये इशारे से कह गए

कमलेश'' क्यों छोड़ दे !अभी से जीना जिन्दगी ,
अरमानों का क्या !कभी ये गये कभी वो गये ...!!

3 comments:

M VERMA ने कहा…

अब भी वक्त है संभालो अंजुमन अपनी ,
जाते हुए तूफ़ान ये इशारे से कह गए ।
और जो इशारा न समझे उसका क्या?
सुन्दर रचना

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर!
अरमानों के महल रेत के घरौंदो जैसे ही होते हैं!

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

अब भी वक्त है संभालो अंजुमन अपनी ,
जाते हुए तूफ़ान ये इशारे से कह गए ।

सुन्दर भाव हैं !