रविवार, 31 जुलाई 2011 | By: kamlesh chander verma

विश्वास की इन टूटती डालियों को.....!!

विश्वास की इन टूटती डालियों को ,
कोई तो उठ के सहारा दे दो ,

छोडो ना इनको भाग्य के भरोसे ,
बस साथ होने का इशारा दे दो ,

पहुँच कर रहेंगे ये अपनी मंजिल तलक ,
पूरी राह नही
,बस चलने को किनारा दे दो ,

ये भर कर रहेंगे दिलों में उजालों की बिजलियाँ ,
बस इनको विश्वास का इक शरारा दे दो ,

जुल्म की सत्ता हटाने की हमको नही जरूरत ,
बस शान से जीने का हक हमारा दे दो ,

तन मन धन से हम हैं इनके साथ सब ,
बस 'कमलेश , इस अहसास का हुलारा दे दो

3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर ग़ज़ल लिखी है आपने!
--
आज पूरे 36 घंटे बाद ब्लॉग पर आया हूँ!
धीरे-धीरे सब जगह पहुँच जाऊँगा!

kase kahun?by kavita verma ने कहा…

sunder gazal...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।