गुरुवार, 3 अप्रैल 2014 | By: kamlesh chander verma

समझा ना सके...!!

तेरी चिलमन की बंदिशें हटा ना सके,
है चाँद छुपा इसमें,खुद को बता ना सके।।

है इंतजार हवा के झोंके का मुझको,
खुद तो उलझन  सुलझा ना सके।।

चिराग  उम्मीदों  के जला रखे हैं,
कोई तूफां भी इसको बुझा ना सके।।

कभी तो 'कमलेश' होगा दीदार उनका,
ये अपने ही दिल को समझा ना सके।।


3 comments:

संजय भास्‍कर ने कहा…

बहुत बेहतरीन रचना....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

राजेंद्र कुमार ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (04.04.2014) को "मिथकों में प्रकृति और पृथ्वी" (चर्चा अंक-1572)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

Shekhar Suman ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन में शामिल किया गया है... धन्यवाद....
सोमवार बुलेटिन