शनिवार, 25 जून 2011 | By: kamlesh chander verma

देखो !कैसे राजनीतिक बगुलों ने ....


देखो ! कैसे राजनीतिक बगुलों ने, तन उघार दिए ,
दो-मुहे सापों ने नकली मुखौटे , [केंचुलें ]उतार दिए ,

इतना बड़ा धोखा इस देश में ,
फिरते हैं शिखंडी मंत्रियों के वेश में ,

आम आदमी की खिल्ली, उड़ा रहें हैं ये ,
विशिष्ट गधों को बिरयानी खिला रहें हैं ये ,

तभी तक आम जन , इनके लिये खास था ,
जब ''कोई'' बैठा करने इनके विरुद्ध उपवास था ,

देखा ?हाय !ये तो क्या अजब हो गया ,
मानने -मनाने में ये तो गजब हो गया ,

कहाँ हम[सरकार] गए इन छुट -भइयों की बातों में ,
इनकी शक्लें दिखनी लगी उनको {भ्रष्टाचारियों }रातों में ,

असली चेहरा दिख ही गया , सत्ता के मद-मतवालों का ,
कोरा जवाब मिल गया देश को ,छद्म जन-तन्त्र रखवालों का ,

'कमलेश' क्या असहाय है जनतंत्र ,राज-तन्त्र सब पर भारी है ,
सब मिल कर दें इनको जवाब ,हम सब की अब बारी है

1 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत बढ़िया रचना!
सभी अशआर बहुत खूबसूरत हैं!