शुक्रवार, 24 जून 2011 | By: kamlesh chander verma

जब-जब कभी व्यथित....!!,

जब-जब कभी  व्यथित, ये संसार हुआ है  ,
 किसी न किसी सुआत्मा, का अवतार हुआ है ,

आज के  सन्दर्भ में  सबसे  बड़ा  'भ्रष्टाचार 'दानव है ,
जिसके जुल्मों से त्रश्त , हर  भारतीय   मानव  है ,

समन्दर के सीने से निकली ,ये लहर दूर तक जाएगी ,
जो भी आएगा इसकी राह में ,'कहाँ' बहा ले जाएगी ,

करो प्रसस्त मार्ग इसका ,उठा लो अपने पत्थर 'रोड़े ,
जन-वेग निहित है अंतर में ,न समझो इनको थोड़े ,

जनहित  को कर  दर किनार ,नही सम्भव राज चले ,
ज्यादा दिन न पहले चला किसी का, ना आज चले ,

'कमलेश' समझ है  सब  उनको, ये जनता क्या कहती है ?
पर उनको सदा ये लगा ,ये तो ऐसे ही  कहती रहती है ,..




3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर और प्रेरणादायक कविता रची है आपने!
शुभकामनाएँ!

Udan Tashtari ने कहा…

जनहित को कर दर किनार ,नही सम्भव राज चले
ज्यादा दिन न पहले चला किसी का, ना आज चले ,


-बिल्कुल सही...समय आ गया है.

Patali-The-Village ने कहा…

बशुत सुन्दर सार्थक अभिव्यक्ति| धन्यवाद|