रविवार, 5 अक्तूबर 2014 | By: kamlesh chander verma

इंतज़ार है ।।

मुद्दतों से तेरी राहे बरी का इंतजार है,
परेशान नहीं हूँ बिलकुल यही प्यार है।।
जूस्त्जू दिल की हो आमदे मंजिल ,
इतना तो सोचने का दिल को भी अख्तियार है।।
प्यार की इमारत बुलंद है जिस नींव पर,
जिसमे ना कोई शक की इक भी दरार है।।
ले आई है चाहतों की कश्ती मझधार में,
मुस्तकबिल है वाबस्ता किस्मत की पतवार है ।।
कमलेश"इस दिल की खाशियत है यही,
कभी नाशाद है.....कभी बेकरार है ।।

1 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (06-10-2014) को "स्वछता अभियान और जन भागीदारी का प्रश्न" (चर्चा मंच:1758) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'