शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010 | By: kamlesh chander verma

गुस्ताखियाँ ...!!!कमलेश वर्मा

मन तडपता है देख कर, उसकी नादानियाँ ,
समझ 'दिल की' करती है मनमानियां


पहले जैसा अब कुछ भी नहीं ऐसा ,
अब तो बस होती हैं ,हैरानियाँ


जहाँ मचलती थी बहारें चमन में ,
आज बस !बसती हैं उधर वीरानियाँ


ऐसी फितरत नही थी, उसकी कभी ,
ये बस हैं!! वक्त की मेहरबानियाँ


जिन्दा रहेंगी ,यादें मेरी तेरे जहन में ,
हवाएं सुनाएंगी ''कमलेश''की कहानियां

3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा है!
यदि आप छन्द की मात्राएँ भी गिन लिया करें तो बहुत ही सुन्दर रचना कहलायेगी!

Udan Tashtari ने कहा…

जहाँ मचलती थी बहारें चमन में ,
आज बस !बसती हैं उधर वीरानियाँ ।

-जरा पता ठिकाना भी मालूम हो भाई...

बहुत खूब!!

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

...बेहतरीन रचना!!!