शुक्रवार, 22 जनवरी 2010 | By: kamlesh chander verma

देखो जमाने का क्या ?

देखो जमाने का क्या ? मिजाज़ हो गया ,
'सही' के लिए लेना रिश्वत रिवाज़ हो गया

देखो सच्चाई सरे आम बे-पर्दा हो गयी ,
झूठ ,फरेब ,मक्कारी का हिजाब हो गया

रंग बदलते लोग यहाँ गिरगिट की तरह ,
उनकी आदत में सफ़ेद-झूठ खिजाब हो गया

गये कातिल की शिकायत ले मुंसिफ के पास ,
बाहर आये ,मुस्कराए कहा 'हिसाब हो गया

जिन्दगी भर पलकों पर रखने की खाई थी कसम ,
झपकी पलकें 'और' किसी का इन्तखाब हो गया

तुमसे है मुहब्बत की तेरे जिस्म से ,
पैमाने बदले पसंद हुस्ने-शबाब हो गया

'कमलेश' कातिल को यहाँ क्या ?मिलेगी सजा ,
जो अब तक हमदर्द था ,उनका हमराज हो गया


2 comments:

Udan Tashtari ने कहा…

तुमसे है मुहब्बत न की तेरे जिस्म से ,
पैमाने बदले पसंद हुस्ने-शबाब हो गया ।

-वाह जी, यह भी खूब रही!!

Suman ने कहा…

रंग बदलते लोग यहाँ गिरगिट की तरह ,
उनकी आदत में सफ़ेद-झूठ खिजाब हो गया ।nice