शनिवार, 7 नवंबर 2009 | By: kamlesh chander verma

रहना था तेरे...!!!

रहना था तेरे शहर में ,

इरादे बदल गये । .

मुझ पर ये इल्जाम क्यूँ ?,

तेरे वादे बदल गये

जिन्दगी गुजरने की ख्वाहिस ,

दिल में थी मेरे ,

साथ- साथ चले थे ये क्या ?रस्ते बदल गये

ढूढेंगे जिन्दगी को जाके कहीं और ,

निशां तो अभी बाकी है ,

गर कारवां उजड़ गये ,।

कमलेश कैसे यकीं हो तेरी बात पर ,

जहाँ शहंशाह बदला नही ,प्यादे बदल गये

2 comments:

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत खूब, सुन्दर रचना।

aarya ने कहा…

कमलेश जी
सादर वन्दे!
हम भी कुछ कहना चाहते थे
लेकिन संभल गए ........
सुन्दर रचना , बधाई
रत्नेश त्रिपाठी