बुधवार, 19 अगस्त 2009 | By: kamlesh chander verma

पंखुड़ी लरज गई . !


पंखुड़ी लरज गयी ,

पड़ी ओस की बूँद ,

सकुच कर फ़िर कली बन गयी ,,।

कब तक शर्माती ,इस ज़माने से ,

रात बीती ,फ़िर सुबह ,खिल कर तन गई ।,

पहले डरती थी ,औरों से ,

अब ख़ुद इठलाती भवरों से

चल
गया पता ,कब खिलना है

किस किस , से कब मिलना है

पर वक्त का था ,क्या पता ,,

टूट गई डाली ,जहाँ टूटना था पत्ता

सुंदर
,सुघर ,सलोने सपने ,

हो सके उसके अपने ,,

जीवन चक्र का सही यही संदेश ,

नही मिलना था ,नही मिलता है !''कमलेश ''।।

1 comments:

Udan Tashtari ने कहा…

थोड़ा वर्तनी पर ध्यान दें.