बुधवार, 19 अगस्त 2009 | By: kamlesh chander verma

तड़फ !!

असहाय,असहज,

पाता क्यूं हूँ ?

इस व्यवस्था के चक्रव्यहू में,

प्रयत्नशील हूँ,

इस से निकल जावूँ

,
पर विफल हो,

किनारे पाता हूँ

मन में बस हैं द्वन्द्ध ,

क्यों कर , कर पाया

,
विरोध कुतर्कों का

अभिमन्यु
का कत्ल ?

करेंगे पांडव क्या ?

सत्ता और व्यवस्था में

,
है सर्वत्र कौरव ही

काल स्वरूप पांडव

,परिवर्तन से नही बचे

कुतर्क बोधहो

,
गया है आज के

अर्जुन को